त्रिपुरा भैरवी देवी

उत्पत्ति कथा : पुराणों अनुसार जब भगवान शिव की पत्नी सती ने दक्ष के यज्ञ में जाना चाहा तब शिवजी ने वहां बिना निमंत्रण जाना उचित नहीं समझा ।

इस पर माता ने काली शक्ति प्रकट की फिर दसों दिशाओं में दस शक्तियां प्रकट कर अपनी शक्ति की झलक दिखला दी। अति भयंकरकारी दृश्य बन गया। सती ने शिव जी को कहा, ‘मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी ही। या तो उसमें अपना हिस्सा लूंगी या उसका विध्वंस कर दूंगी।’

शिवजी सती के सामने आ खड़े हुए।

सती ने बताया,

‘ये मेरे दस रूप हैं। आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं,

आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं।

पश्चिम में छिन्नमस्ता,

बाएं भुवनेश्वरी,

पीठ के पीछे बगलामुखी,

पूर्व-दक्षिण में धूमावती,

दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी,

पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा

उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं और

मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।’

यही दस महाविद्या अर्थात् दस शक्ति है।

बाद में मां ने अपनी इन्हीं शक्तियां का उपयोग दैत्यों और राक्षसों का वध करने के लिए किया था।

देवी कथा :

नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार एक बार जब देवी काली के मन में आया कि वह पुनः अपना गौर वर्ण प्राप्त कर लें तो यह सोचकर देवी अन्तर्धान हो जाती हैं। भगवान शिव जब देवी को को अपने समक्ष नहीं पाते तो व्याकुल हो जाते हैं और उन्हें ढूंढने का प्रयास करते हैं। शिवजी, महर्षि नारदजी से देवी के विषय में पूछते हैं तब नारदजी उन्हें देवी का बोध कराते हैं वह कहते हैं कि शक्ति के दर्शन आपको सुमेरु के उत्तर में हो सकते हैं। वहीं देवी की प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात संभव हो सकेगी। तब भोले शिवजी की आज्ञानुसार नारदजी देवी को खोजने के लिए वहां जाते हैं। महर्षि नारदजी जब वहां पहुंचते हैं तो देवी से शिवजी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखते हैं यह प्रस्ताव सुनकर देवी क्रुद्ध हो जाती हैं और उनकी देह से एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट होता है और इस प्रकार उससे छाया विग्रह ‘त्रिपुर-भैरवी’ का प्राकट्य होता है।

त्रिपुर भैरवी :

त्रिपुर भैरवी की उपासना से सभी बंधन दूर हो जाते हैं। यह बंदीछोड़ माता है। भैरवी के नाना प्रकार के भेद बताए गए हैं जो इस प्रकार हैं त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी तथा षटकुटा भैरवी आदि। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता हैं।

माता की चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। इन्हें षोडशी भी कहा जाता है। षोडशी को श्रीविद्या भी माना जाता है। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।

जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य सिद्धि के लिए इस देवी की आराधना की जाती है। इसकी साधना से धन सम्पदा की प्राप्ति होती है, मनोवांछित वर या कन्या से विवाह होता है। षोडशी का भक्त कभी दुखी नहीं रहता है।

नौ दुर्गा :

नवदुर्गा मंत्र साधना

1. शैलपुत्री,

2. ब्रह्मचारिनी,

3. चन्द्र धन्टा,

4. कुष्मांडा,

5. स्कन्द माता,

6. कात्यायनी देवी,

7. कालरात्रि देवी,

8. महागौरीऔर

9. सिद्घिदात्री देवी

दस महा विद्या : दस महाविधा मंत्र साधना

1.काली,

2.तारा,

3.त्रिपुरसुंदरी,

4.भुवनेश्वरी,

5.छिन्नमस्ता,

6.त्रिपुरभैरवी,

7.धूमावती,

8.बगलामुखी,

9.मातंगी और

10.कमला।

प्रवृति के अनुसार दस महाविद्या के तीन समूह हैं। पहला:- सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला), दूसरा:- उग्र कोटि (काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी), तीसरा:- सौम्य-उग्र कोटि (तारा और त्रिपुर भैरवी)।

माँ त्रिपुर भैरवी के अन्य तेरह स्वरुप हैं इनका हर रुप अपने आप अन्यतम है। माता के किसी भी स्वरुप की साधना साधक को सार्थक कर देती है। माँ त्रिपुर भैरवी कंठ में मुंड माला धारण किये हुए हैं। माँ ने अपने हाथों में माला धारण कर रखी है। माँ स्वयं साधनामय हैं उन्होंने अभय और वर मुद्रा धारण कर रखी है जो सदैव अपने भक्तों को सौभाग्य प्रदान करती है। माँ ने लाल वस्त्र धारण कियए है, माँ के हाथ में विद्या तत्व है। माँ त्रिपुर भैरवी की पूजा में लाल रंग का उपयोग करने से माता अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाती है।माँ त्रिपुर भैरवी बीज मंत्र
माँ त्रिपुर भैरवी के बीज मंत्रों का जप करने से एक साथ अनेक संकटों से मुक्ति मिल जाती है। इन मंत्रों का जप करने वाला अत्यधिक धन का स्वामी बनकर जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य का अधिकारी बन जाता है।

यहां दस महाविद्या का परिचय और उनके चमत्कारिक मंत्र दिए जा रहे हैं।

भैरवी काम उत्पीड़न से बचने का सांसारिक व प्रायोगिक है। वह है शिव एवं शक्ति को अपने जीवन में समान महत्व देना, उनकी उपासना एवं त्रिपुर भैरवी की अराधना। इस भैरवी उत्पीड़न से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है श्री त्रिपुर भैरवी की तांत्रोक्त अराधना एवं भैरव्यास्त्र।

साधक व त्रिपुरा सुंन्दरी के बीच उनकी रथवाहिका के रूप में रास्ता रोके खड़ीं होती हैं – श्री त्रिपुर भैरवी। जिस की सन्तुष्टि पूजन साधना से ही रास्ता सुगम है जाता है।

Tripura Bhairavi

त्रिपुरा भैरवी मंत्र साधना

त्रिपुरा भैरवी मंत्र Tirpura Bhairavi

महाविद्या त्रिपुरा भैरवी


दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या है !
माँ त्रिपुर भैरवी के स्वरूप
शास्त्रों में माँ भैरवी के विभिन्न स्वरूप होते हैं जो इस प्रकार हैं-

त्रिपुरा भैरवी,
चैतन्य भैरवी,
सिद्ध भैरवी,
भुवनेश्वर भैरवी,
संपदाप्रद भैरवी,
कमलेश्वरी भैरवी,
कौलेश्वर भैरवी,
कामेश्वरी भैरवी,
नित्याभैरवी,
रुद्रभैरवी,
भद्र भैरवी एवं
षटकुटा भैरवी आदि।

देवी भागवत के अनुसार महाकाली के उग्र और सौम्य दो रुपों में अनेक रुप धारण करने वाली दस महा-विद्याएं है। माँ का स्वरूप सृष्टि के निर्माण और संहार क्रम को जारी रखे हुए है। माँ त्रिपुर भैरवी तमोगुण एवं रजोगुण से परिपूर्ण हैं।

महाविद्या त्रिपुरा भैरवी की साधना  नवरात्रि या शुक्ल पक्ष के बुधवार या शुक्रवार के दिन से शुरू कर सकते हैं !
समय रात्रि नौ बजे के बाद कर सकते हैं !

माँ त्रिपुर भैरवी साधना पूजा विधि



साधक को स्नान करके शुद्ध लाल वस्त्र धारण करके अपने घर में किसी एकान्त स्थान या पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की तरफ़ मुख करके लाल ऊनी आसन पर बैठ जाए !
उसके बाद अपने सामने चौकी रखकर उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव यंत्र स्थापित करें !
फिर प्लेट रखकर रोली से त्रिकोण बनाये उस त्रिकोण में पर के ऊपर सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त “त्रिपुरा भैरवी यंत्र” को स्थापित करें !

उसके बाद यन्त्र के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाकर यंत्र का पूजन करें ।

तुम्हारे एवं  त्रिपूरा सुन्दरी  के बीच उनकी रथवाहिका के रूप में रास्ता रोके खड़ीं हैं – श्री त्रिपुर भैरवी।

त्रिपुर भैरवी यंत्र पर मंत्र पढ़ते हुए कुछ लाल पुष्प विषेशकर गुलाब के फूल चढ़ा देना।
भैरवी  से मुक्ति का रास्ता मिल जाएगा। सुगन्धित इत्र बेला, गुलाब या चमेली का भी साथ में चढ़ा देना।
और मन्त्र विधान अनुसार संकल्प आदि कर सीधे हाथ में जल लेकर

विनियोग पढ़े :



ॐ अस्य श्री त्रिपुर भैरवी मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि: पंक्तिश्छ्न्द: त्रिपुर भैरवी देवता वाग्भवो बीजं शक्ति बीजं शक्ति: कामराज कीलकं श्रीत्रिपुरभैरवी प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:

ऋष्यादि न्यास : 

बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से नीचे दिए गये निम्न मंत्रो का उच्चारण करते हुए अपने भिन्न भिन्न अंगों को स्पर्श करें.
मंत्र :

दक्षिणामूर्तये ऋषये नम: शिरसि ( सर को स्पर्श करें )

पंक्तिच्छ्न्दे नम: मुखे ( मुख को स्पर्श करें )

श्रीत्रिपुरभैरवीदेवतायै नम: ह्रदये ( ह्रदय को स्पर्श करें )

वाग्भवबीजाय नम: गुहे ( गुप्तांग को स्पर्श करें )

शक्तिबीजशक्तये नम: पादयो: ( दोनों पैरों को स्पर्श करें )

कामराजकीलकाय नम: नाभौ ( नाभि को स्पर्श करें )

विनियोगाय नम: सर्वांगे ( पूरे शरीर को स्पर्श करें )

कर न्यास :


अपने दोनों हाथों के अंगूठे से अपने हाथ की विभिन्न उंगलियों को स्पर्श करें, ऐसा करने से उंगलियों में चेतना प्राप्त होती है ।

हस्त्रां अंगुष्ठाभ्यां नम: ।

ह्स्त्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।

ह्स्त्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।

हस्त्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।

ह्स्त्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।

हस्त्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।

ह्र्दयादि न्यास : 


पुन: बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से नीचे दिए गये निम्न मंत्रों के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करते हुए ऐसी भावना मन में रखें कि वे सभी अंग तेजस्वी और पवित्र होते जा रहे हैं ! ऐसा करने से आपके अंग शक्तिशाली बनेंगे और आपमें चेतना प्राप्त होती है !

न्यास करें :


हस्त्रां ह्रदयाय नम: ।

हस्त्रां शिरसे स्वाहा ।

ह्स्त्रूं शिखायै वषट् ।

हस्त्रां कवचाय हुम् ।

ह्स्त्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

हस्त्र: अस्त्राय फट् ।

त्रिपुर भैरवी ध्यान : इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती त्रिपुर भैरवी का ध्यान करके पूजन करें। धुप, दीप, चावल, पुष्प से ।



इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती त्रिपुर भैरवी का ध्यान करके, त्रिपुर भैरवी माँ का पूजन करे धुप, दीप, चावल, पुष्प से तदनन्तर त्रिपुर भैरवी महाविद्या का पूजा करें !

ध्यान


उधदभानुसहस्त्रकान्तिमरूणक्षौमां शिरोमालिकां,

रक्तालिप्रपयोधरां जपवटी विद्यामभीतिं परम् ।

हस्ताब्जैर्दधतीं भिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं,

देवी बद्धहिमांशुरत्नस्त्रकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ।।

तांत्रोक्त श्री त्रिपुर भैरवी ध्यान:-

   हं हं हं हंस हंसी स्मित कह कह चामुक्त घोर अट्टहासा। खं खं खं खड्गहस्ते त्रिभुवन निलये कालभैरवी कालधारी।।
रं  रं  रं  रंगरंगी  प्रमुदित  वदने  पिर्घैंकेषी  श्मशाने।
यं  रं  लं  तापनीये  भ्रकुटि  घट  घटाटोप,  टंकार जापे।।

हं हं हंकारनादं नर पिषितमुखी संधिनी साध्रदेवी।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं कुष्माण्ड मुण्डी वर वर ज्वालिनी पिंगकेषी कृषांगी।।
खं खं खं भूत नाथे किलि किलि किलिके एहि एहि प्रचण्डे। ह्रुम ह्रुम ह्रुम भूतनाथे सुर गण नमिते मातरम्बे नमस्ते।।
भां भां भां भावैर्भय हन हनितं भुक्ति मुक्ति प्रदात्री। भीं भीं भीं भीमकाक्षिर्गुण गुणित गुहावास भोगी सभोगी।। भूं भूं भूं भूमिकम्पे प्रलय च निरते तारयन्तं स्व नेत्रे।
भें भें भें भेदनीये हरतु मम भयं भैरव्ये त्वां नमस्ते।। हां हां हाकिनी स्वरूपिणी भैरवी क्षेत्रपालिनी।
कां कां कां कानिनी स्वरूपा भैरवी व्याधिनाशिनी।।

रां रां रां राकिनी  स्वरूपा भैरवी शत्रुमर्द्दिनी।
लां लां लां लाकिनी स्वरूपा भैरवी दुःख दारिद्रनाषिनी।। भैं भैं भैं भ्रदकालिके क्रूर ग्रह बाधा निवारिणी।
फ्रैं फ्रैं फ्रैं नवनाथात्मिके गूढ़ ज्ञानप्रदायिनि।।
ईं ईं ईं रूद्रभैरवी स्वरूपा रूद्रग्रंथिभेदिनि।
उं उं उं विश्णुवामांगे स्थिता विष्णु ग्रंथि भेदिनी।
च्लूं च्लूं च्लूं  नीलपताके सर्वसिद्धि प्रदायिनी ।
अं अं अं अंतरिक्षे सर्वदानव ग्रह बंधिनी।।

स्त्रां स्त्रां स्त्रां सप्तकोटि स्वरूपा आदिव्याधि त्रोटिनी। क्रों क्रों क्रों कुरूकुल्ले दुष्ट प्रयोगान नाशिनी।।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं अंबिके भोग मोक्ष प्रदायिनी।
क्लीं क्लीं क्लीं कामुके कामसिद्धि दायिनी।।

ऊपर दिया गया पूजन सम्पन्न करके सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित “मूंगा’ माला” की माला से नीचे दिए गये मंत्र की 23 माला 11 दिनों या 63 माला 21 दिन तक जप करें ! और मंत्र उच्चारण करने के बाद त्रिपुर भैरवी का मंत्र जप मंत्र सिद्ध भैरवी माला से करें !

माँ त्रिपुर भैरवी साधना सिद्धि मन्त्र


॥ ह सें ह स क रीं ह सें ॥


या

॥ ॐ हसरीं त्रिपुर भैरव्यै नम: ॥


त्रिपुरा भैरवी तंत्र मंत्र साधना
त्रिपुर भैरवी का मंत्र : मुंगे की माला से पंद्रह माला

‘ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:’

मंत्र का जाप कर सकते हैं।

माँ त्रिपुर भैरवी बीज मंत्र
माँ त्रिपुर भैरवी के बीज मंत्रों का जप करने से एक साथ अनेक संकटों से मुक्ति मिल जाती है। इन मंत्रों का जप करने वाला अत्यधिक धन का स्वामी बनकर जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य का अधिकारी बन जाता है। साथ ही मनोवांछित वर या कन्या को जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करता है।
1- ।। ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:।।
2- ।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।।
3- ।। ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:।।

जाप के नियम के लिये मेसेज करें ।

भैरवी लिंग मंत्र साधना

मां लिंग भैरवी
लिंग भैरवी बहुत शक्तिशाली ऊर्जा का स्त्रैण स्वरूप हैं. ऐसे ऊर्जा-स्वरूप जो काफी दुर्लभ हैं.
ऐसे कुछ ऊर्जा-स्वरूप लिंग , जो कि स्त्रियोचित लिंग हैं.  भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जहां योनि रूप स्थापित हैं. योनि यानी स्त्री जनन अंग को देवी मां की तरह पूजा जाता है. इस तरह के मंदिर पूरी दुनिया में हैं.
भारत में ऐसे बहुत सारे मंदिर हैं – कामाख्या मंदिर इनमें से एक है. लेकिन स्त्रियोचित ऊर्जा को लिंग के रूप में पूजना दुर्लभ है. ऐसे बहुत ही कम मंदिर हैं और वे भी सार्वजनिक जगहों पर नहीं हैं.
स्त्रियोचित ऊर्जा का यह सबसे तीव्र और प्रखर रूप है.

लिंग भैरवी की ऊर्जा मानव शरीर के तीन मूल चक्रों को मजबूती देती है जिससे इंसान का शरीर, मन और ऊर्जा प्रणाली स्थिर होते हैं।


जो लोग जीवन को गहराई में जीना चाहते हैं, देवी की मौजूदगी और कृपा इस प्रक्रिया में उनकी मदद करती है। आध्यात्मिक सुख चाहने वाले लोगों के लिए यह कृपालु देवी रास्ते की बाधाओं को दूर करती हैं और उन्हें परम मुक्ति तक पहुंचाती है।
लिंग भैरवी और संभोग शक्ति एक दूसरे से आत्मिक रूप से जुडे हैं।  लिंगम् शक्ति के बिना संभोग संभव नही है। योनि, नारी शक्ति का ज्वालामुखी है जबकि लिंग, नर  ऊर्जा का प्रचंड वेग है। सम्भोग क्रिया के द्वारा ही ये दोनों ऊर्जा एक हो जाती हैं और सृष्टि में नया सृजन करते हैं। सृष्टि मे सम्भोग और सृजन निरन्तर चलता रहता है। सम्भोग परमानन्द का क्षणिक भाग है और इसे आनन्द कहते हैं। जब ये आनन्द अनन्त हो जाता है तो परमानन्द कहलाता है। स्वयं को इस परमानन्द में स्थापित करना ही मोक्ष है।
जब कोई भी आत्मा परमानन्द में लीन होती है तो वो अन्तहीन आनन्द में डूब जाती है। वो सदैव सम्भोग में रत है। वो अनन्त सम्भोग में डुबी है। यही पुर्ण समाधि है। परमपुरुष प्रकृति के साथ सदैव सम्भोगरत है।

लिंग भैरवी लिंगम् शक्ति है। इस शक्ति के बिना सम्भोग का आनन्द प्राप्त नही किया जा सकता। नारी ऊर्जा, प्रेम और सम्भोग पर टिकी है। सम्भोग प्रेम का उच्चतम बिन्दु है।

जो नर,  नारी को प्रेम और सम्भोग मे संतुष्ट नही कर सकता, नारी उसका त्याग कर देती है।
जो पुरूष, नारी को सम्भोग में पूर्ण संतुष्ट कर सकता है, नारी उसके वशीभूत रहती है।

नारी को नर ऊर्जा लिंग से सम्भोग क्रिया के द्वारा प्राप्त होती है। नारी सदैव प्रेम की भूखी है। नारी को प्रेम से ही अपने आधीन किया जाता है।

लिंग भैरवी की उपासना से लिंगम् शक्ति बढती है। ये नर ऊर्जा को और ज्यादा बलवान बना देती है जिससे नर, नारी को रति क्रिया में संतुष्ट कर, खुद भी लम्बे समय तक सम्भोग आनन्द प्राप्त करता है। लेकिन एक बात सदैव ध्यान रखें कि नारी भोग की वस्तु नही है बल्कि जननी है। याद रखिये कि आप स्वयं भी नारी से ही पैदा हुए है। नारी सदैव आदरणीय है।
लिंग भैरवी अर्पण: देवी स्थान में कई तरह के चढ़ावे चढ़ाए जाते हैं, जिससे कि श्रद्धालुओं को देवी की अनंत कृपा का लाभ मिल सकें।।

लिंग भैरवी स्तुति


जय भैरवी देवी गुरुभ्यो नमः श्री

जय भैरवी देवी स्वयम्भो नमः श्री

जय भैरवी देवी स्वधारिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी महाकल्याणी नमः श्री

जय भैरवी देवी महाभद्राणि नमः श्री

जय भैरवी देवी महेश्वरी नमः श्री

जय भैरवी देवी नागेश्वरी नमः श्री

जय भैरवी देवी विश्वेश्वरी नमः श्री

जय भैरवी देवी सोमेश्वरी नमः श्री

जय भैरवी देवी दुख सम्हारी नमः श्री

जय भैरवी देवी हिरण्य गर्भिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी अमृत वर्षिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी भक्त-रक्षिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी सौभाग्य दायिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी सर्व जननी नमः श्री

जय भैरवी देवी गर्भ दायिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी शून्य वासिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी महा नंदिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी वामेश्वरी नमः श्री

जय भैरवी देवी कर्म पालिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी योनिश्वरी नमः श्री

जय भैरवी देवी लिंग रूपिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी श्याम सुंदरी नमः श्री

जय भैरवी देवी त्रिनेत्रिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी सर्व मंगली नमः श्री

जय भैरवी देवी महा योगिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी क्लेश नाशिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी उग्र रूपिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी दिव्य कामिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी काल रूपिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी त्रिशूल धारिणी नमः श्री

जय भैरवी देवी यक्ष कामिनी नमः श्री

जय भैरवी देवी मुक्ति दायिनी नमः श्री

आओम महादेवी लिंग भैरवी नमः श्री

आओम श्री शाम्भवी लिंग भैरवी नमः श्री

आओम महा शक्ति लिंग भैरवी नमः श्री नमः श्री नमः श्री देवी नमः श्री

ऋण मुक्ति के लिए लिंग भैरवी साधना:-

ये साधना केवल उन व्यक्तियो के लीग है जो इस समय किन्ही भी कारणों से चारो तरफ से भारी ऋण से डूब गए है और जिनको कोई भी सही मार्ग नहीं मिल रहा है अपने ऋण को उतरने के लिए।ऐसे व्यक्ति इस साधना को करके खुद ही अपनी ज़िन्दगी को सही रस्ते पर आती हुई देख ले।
ऋण मुक्ति कीअचूक और सटीक अघोर साधना:-
मैं जहां एक बहुत ही सरल
अनुभूत साधना प्रयोग दे
रहा हु आप निहचिंत हो कर
करे बहुत जल्द आप इस ऋण रूपी अभिशाप
… से मुक्ति पा लेंगे !
विधि –
शुभ दिन जिस दिन
रविपुष्य योग
हो जो रविवार हस्त नक्षत्र
हो शुक्ल पक्ष हो तो इस
साधना को शुरू करे
वस्त्र — लाल रंग की धोतीपहन सकते है !
माला – काले हकीक की ले !
दिशा –दक्षिण !
सामग्री – लिंग भैरवी यन्त्र का चित्र और हकीक
माला काले रंग की ! मंत्र संख्या – 12 माला 21
दिन करना है !
पहले गुरु पूजन कर आज्ञा लेऔर
फिर श्री गणेश
जी का पंचौपचार पूजन करे तद
पहश्चांत संकल्प ले की मैं माँ लिंग भैरवी आपकी शरण में आरहा हु मेरे कष्टो का निवारण करे।और मैं मेरे समस्त ऋण मुक्ति के लिए
यहसाधना कर रहा हु हे लिंगभैरवी
देवी मुझे ऋण मुक्ति दे!जमीन पे
थोरा रेत बिछा के उस उपर कुमकुम से तिकोण बनाएउस में एक
पलेट में स्वास्तिक बना कर उस
पे लालरंग का फूल रखे उस पे
लिंग भैरवी यन्त्र की स्थापना करे
उस यन्त्र का जा चित्र
लिंग भैरवी यन्त्र की स्थापना करे
उस यन्त्र का जा चित्र
का पंचौपचार से पूजन करे तेल का दिया लगाए और भोग के
लिए गुड रखे या लड्डू भी रख
सकते है ! मन को स्थिर रखते
हुये मन ही मन ऋण मुक्ति के
लिए पार्थना करे और जप
शुरूकरे 12 माला जप रोज करे इस प्रकार 21 दिन करे
साधना के बाद
सामग्री ,माला ,यन्त्र और
जो पूजन किया है वो सामान
जल प्रवाह कर दे साधना के
दौरान रविवार या मंगल वार को छोटे
बच्चो को मीठा भोजनआदि जरूर
कराये ! शीघ्र ही कर्ज से
मुक्ति मिलेगी और कारोबार
में प्रगति भी होगी !
मंत्र—
ॐ ऐं क्लीम ह्रीं लिंग लिंग लिंगभैरविः मम
ऋणविमोचनाये महां महा धन
प्रदाय क्लीम स्वाहा !!

त्रिपुरा भैरवी हवन यज्ञ

Tripura Bhairavi Hawan

माँ त्रिपुर भैरवी की जयंती के दिन पूजा, मंत्र जप, हवन यज्ञ आदि कर्म करने से प्रसन्न होकर माता सारे दुख, क्लेश नष्ट हो जाते हैं। साधना पूरी होने के बाद मन्त्रों का जाप करने के बाद दिए गये मन्त्र जिसका आपने जाप किया हैं उस मन्त्र का दशांश ( 10% भाग ) हवन अवश्य करें ! हवन में कमल गट्टे, कलम पुष्प, शुद्ध घी व् हवन सामग्री को मिलाकर आहुति दें ! हवन के बाद त्रिपुर भैरवी यंत्र को अपने घर के मंदिर या तिजोरी में लाल वस्त्र से बांधकर एक साल के लिए रख दें . और बाकि बची हुई पूजा सामग्री को नदी या किसी पीपल के नीचे विसर्जन कर आयें ! ऐसा करने से साधक की साधना पूर्ण हो जाती हैं ! और साधक के ऊपर माँ त्रिपुर भैरवी देवी की कृपा सदैव बनी रही हैं ! त्रिपुरा भैरवी मंत्र हवन यज्ञ तर्पण मार्जन साधना करने से साधक के जीवन में धन, धान्य और यश प्रदान करती है ! और साधक के जीवन की दरिद्रता समाप्त हो जाती है!

त्रिपुरा भैरवी कवच

समस्त जगत को वश में करने वाला एक दुर्लभ कवच-माँ त्रिपुर भैरवी कवच
आज मैं आपको दस महाविद्या में से एक स्वरुप माँ त्रिपुर भैरवी के एक अत्यंत दुर्लभ कवच के बारे में बताऊंगा, जिसको धारण करने वाला समस्त जगत में विजयी होता है ।

त्रिपुर भैरवी की उपासना से सभी बंधन दूर हो जाते हैं । इनकी उपासना भव-बन्ध-मोचन कही जाती है । इनकी उपासना से व्यक्ति को सफलता एवं सर्वसंपदा की प्राप्ति होती है । शक्ति-साधना तथा भक्ति-मार्ग में किसी भी रुप में त्रिपुर भैरवी की उपासना फलदायक ही है, साधना द्वारा अहंकार का नाश होता है तब साधक में पूर्ण शिशुत्व का उदय हो जाता है, और माता, साधक के समक्ष प्रकट होती है। उनकी प्रसन्नता से साधक को सहज ही संपूर्ण अभीष्टों की प्राप्ति होती है ।श्री त्रिपुर भैरवी कवचम्-


फल-श्रुति

इदं कवचमित्युक्तो, मन्त्रोद्धारश्च पार्वति । य पठेत् प्रयतो भूत्वा, त्रि-सन्ध्यं नियतः शुचिः ।

तस्य सर्वार्थ-सिद्धिः स्याद्, यद्यन्मनसि वर्तते । गोरोचना-कुंकुमेन, रक्त-चन्दनेन वा ।

स्वयम्भू-कुसुमैः शुक्लैर्भूमि-पुत्रे शनौ सुरै । श्मशाने प्रान्तरे वाऽपि, शून्यागारे शिवालये ।

स्व-शक्त्या गुरुणा मन्त्रं, पूजयित्वा कुमारिकाः । तन्मनुं पूजयित्वा च, गुरु-पंक्तिं तथैव च ।

देव्यै बलिं निवेद्याथ, नर-मार्जार-शूकरैः । नकुलैर्महिषैर्मेषैः, पूजयित्वा विधानतः ।

धृत्वा सुवर्ण-मध्यस्थं, कण्ठे वा दक्षिणे भुजे । सु-तिथौ शुभ-नक्षत्रे, सूर्यस्योदयने तथा ।

धारयित्वा च कवचं, सर्व-सिद्धिं लभेन्नरः ।

कवचस्य च माहात्म्यं, नाहं वर्ष-शतैरपि । शक्नोमि तु महेशानि ! वक्तुं तस्य फलं तु यत् ।

न दुर्भिक्ष-फलं तत्र, न चापि पीडनं तथा । सर्व-विघ्न-प्रशमनं, सर्व-व्याधि-विनाशनम् ।

सर्व-रक्षा-करं जन्तोः, चतुर्वर्ग-फल-प्रदम्, मन्त्रं प्राप्य विधानेन, पूजयेत् सततः सुधीः ।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये, कवचं देव-रुपिणम् ।

गुरोः प्रसादमासाद्य, विद्यां प्राप्य सुगोपिताम् । तत्रापि कवचं दिव्यं, दुर्लभं भुवन-त्रयेऽपि ।

श्लोकं वास्तवमेकं वा, यः पठेत् प्रयतः शुचिः । तस्य सर्वार्थ-सिद्धिः, स्याच्छङ्करेण प्रभाषितम् ।

गुरुर्देवो हरः साक्षात्, पत्नी तस्य च पार्वती । अभेदेन यजेद् यस्तु, तस्य सिद्धिरदूरतः ।

इति श्री रुद्र-यामले भैरव-भैरवी-सम्वादे-श्रीत्रिपुर-भैरवी-कवचं सम्पूर्णम्

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