त्रिपुरा भैरवी मंत्र Tirpura Bhairavi
महाविद्या त्रिपुरा भैरवी
दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या है !
माँ त्रिपुर भैरवी के स्वरूप
शास्त्रों में माँ भैरवी के विभिन्न स्वरूप होते हैं जो इस प्रकार हैं-
त्रिपुरा भैरवी,
चैतन्य भैरवी,
सिद्ध भैरवी,
भुवनेश्वर भैरवी,
संपदाप्रद भैरवी,
कमलेश्वरी भैरवी,
कौलेश्वर भैरवी,
कामेश्वरी भैरवी,
नित्याभैरवी,
रुद्रभैरवी,
भद्र भैरवी एवं
षटकुटा भैरवी आदि।
देवी भागवत के अनुसार महाकाली के उग्र और सौम्य दो रुपों में अनेक रुप धारण करने वाली दस महा-विद्याएं है। माँ का स्वरूप सृष्टि के निर्माण और संहार क्रम को जारी रखे हुए है। माँ त्रिपुर भैरवी तमोगुण एवं रजोगुण से परिपूर्ण हैं।
महाविद्या त्रिपुरा भैरवी की साधना नवरात्रि या शुक्ल पक्ष के बुधवार या शुक्रवार के दिन से शुरू कर सकते हैं !
समय रात्रि नौ बजे के बाद कर सकते हैं !
माँ त्रिपुर भैरवी साधना पूजा विधि
साधक को स्नान करके शुद्ध लाल वस्त्र धारण करके अपने घर में किसी एकान्त स्थान या पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की तरफ़ मुख करके लाल ऊनी आसन पर बैठ जाए !
उसके बाद अपने सामने चौकी रखकर उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव यंत्र स्थापित करें !
फिर प्लेट रखकर रोली से त्रिकोण बनाये उस त्रिकोण में पर के ऊपर सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त “त्रिपुरा भैरवी यंत्र” को स्थापित करें !
उसके बाद यन्त्र के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाकर यंत्र का पूजन करें ।
तुम्हारे एवं त्रिपूरा सुन्दरी के बीच उनकी रथवाहिका के रूप में रास्ता रोके खड़ीं हैं – श्री त्रिपुर भैरवी।
त्रिपुर भैरवी यंत्र पर मंत्र पढ़ते हुए कुछ लाल पुष्प विषेशकर गुलाब के फूल चढ़ा देना।
भैरवी से मुक्ति का रास्ता मिल जाएगा। सुगन्धित इत्र बेला, गुलाब या चमेली का भी साथ में चढ़ा देना।
और मन्त्र विधान अनुसार संकल्प आदि कर सीधे हाथ में जल लेकर
विनियोग पढ़े :
ॐ अस्य श्री त्रिपुर भैरवी मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषि: पंक्तिश्छ्न्द: त्रिपुर भैरवी देवता वाग्भवो बीजं शक्ति बीजं शक्ति: कामराज कीलकं श्रीत्रिपुरभैरवी प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:
ऋष्यादि न्यास :
बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से नीचे दिए गये निम्न मंत्रो का उच्चारण करते हुए अपने भिन्न भिन्न अंगों को स्पर्श करें.मंत्र :
दक्षिणामूर्तये ऋषये नम: शिरसि ( सर को स्पर्श करें )
पंक्तिच्छ्न्दे नम: मुखे ( मुख को स्पर्श करें )
श्रीत्रिपुरभैरवीदेवतायै नम: ह्रदये ( ह्रदय को स्पर्श करें )
वाग्भवबीजाय नम: गुहे ( गुप्तांग को स्पर्श करें )
शक्तिबीजशक्तये नम: पादयो: ( दोनों पैरों को स्पर्श करें )
कामराजकीलकाय नम: नाभौ ( नाभि को स्पर्श करें )
विनियोगाय नम: सर्वांगे ( पूरे शरीर को स्पर्श करें )
कर न्यास :
अपने दोनों हाथों के अंगूठे से अपने हाथ की विभिन्न उंगलियों को स्पर्श करें, ऐसा करने से उंगलियों में चेतना प्राप्त होती है ।
हस्त्रां अंगुष्ठाभ्यां नम: ।
ह्स्त्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।
ह्स्त्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।
हस्त्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।
ह्स्त्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।
हस्त्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।
ह्र्दयादि न्यास :
पुन: बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से नीचे दिए गये निम्न मंत्रों के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करते हुए ऐसी भावना मन में रखें कि वे सभी अंग तेजस्वी और पवित्र होते जा रहे हैं ! ऐसा करने से आपके अंग शक्तिशाली बनेंगे और आपमें चेतना प्राप्त होती है !
न्यास करें :
हस्त्रां ह्रदयाय नम: ।
हस्त्रां शिरसे स्वाहा ।
ह्स्त्रूं शिखायै वषट् ।
हस्त्रां कवचाय हुम् ।
ह्स्त्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
हस्त्र: अस्त्राय फट् ।
त्रिपुर भैरवी ध्यान : इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती त्रिपुर भैरवी का ध्यान करके पूजन करें। धुप, दीप, चावल, पुष्प से ।
इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती त्रिपुर भैरवी का ध्यान करके, त्रिपुर भैरवी माँ का पूजन करे धुप, दीप, चावल, पुष्प से तदनन्तर त्रिपुर भैरवी महाविद्या का पूजा करें !
ध्यान
उधदभानुसहस्त्रकान्तिमरूणक्षौमां शिरोमालिकां,
रक्तालिप्रपयोधरां जपवटी विद्यामभीतिं परम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं भिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं,
देवी बद्धहिमांशुरत्नस्त्रकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ।।
तांत्रोक्त श्री त्रिपुर भैरवी ध्यान:-
हं हं हं हंस हंसी स्मित कह कह चामुक्त घोर अट्टहासा। खं खं खं खड्गहस्ते त्रिभुवन निलये कालभैरवी कालधारी।।
रं रं रं रंगरंगी प्रमुदित वदने पिर्घैंकेषी श्मशाने।
यं रं लं तापनीये भ्रकुटि घट घटाटोप, टंकार जापे।।
हं हं हंकारनादं नर पिषितमुखी संधिनी साध्रदेवी।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं कुष्माण्ड मुण्डी वर वर ज्वालिनी पिंगकेषी कृषांगी।।
खं खं खं भूत नाथे किलि किलि किलिके एहि एहि प्रचण्डे। ह्रुम ह्रुम ह्रुम भूतनाथे सुर गण नमिते मातरम्बे नमस्ते।।
भां भां भां भावैर्भय हन हनितं भुक्ति मुक्ति प्रदात्री। भीं भीं भीं भीमकाक्षिर्गुण गुणित गुहावास भोगी सभोगी।। भूं भूं भूं भूमिकम्पे प्रलय च निरते तारयन्तं स्व नेत्रे।
भें भें भें भेदनीये हरतु मम भयं भैरव्ये त्वां नमस्ते।। हां हां हाकिनी स्वरूपिणी भैरवी क्षेत्रपालिनी।
कां कां कां कानिनी स्वरूपा भैरवी व्याधिनाशिनी।।
रां रां रां राकिनी स्वरूपा भैरवी शत्रुमर्द्दिनी।
लां लां लां लाकिनी स्वरूपा भैरवी दुःख दारिद्रनाषिनी।। भैं भैं भैं भ्रदकालिके क्रूर ग्रह बाधा निवारिणी।
फ्रैं फ्रैं फ्रैं नवनाथात्मिके गूढ़ ज्ञानप्रदायिनि।।
ईं ईं ईं रूद्रभैरवी स्वरूपा रूद्रग्रंथिभेदिनि।
उं उं उं विश्णुवामांगे स्थिता विष्णु ग्रंथि भेदिनी।
च्लूं च्लूं च्लूं नीलपताके सर्वसिद्धि प्रदायिनी ।
अं अं अं अंतरिक्षे सर्वदानव ग्रह बंधिनी।।
स्त्रां स्त्रां स्त्रां सप्तकोटि स्वरूपा आदिव्याधि त्रोटिनी। क्रों क्रों क्रों कुरूकुल्ले दुष्ट प्रयोगान नाशिनी।।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं अंबिके भोग मोक्ष प्रदायिनी।
क्लीं क्लीं क्लीं कामुके कामसिद्धि दायिनी।।
ऊपर दिया गया पूजन सम्पन्न करके सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित “मूंगा’ माला” की माला से नीचे दिए गये मंत्र की 23 माला 11 दिनों या 63 माला 21 दिन तक जप करें ! और मंत्र उच्चारण करने के बाद त्रिपुर भैरवी का मंत्र जप मंत्र सिद्ध भैरवी माला से करें !
माँ त्रिपुर भैरवी साधना सिद्धि मन्त्र
॥ ह सें ह स क रीं ह सें ॥
या
॥ ॐ हसरीं त्रिपुर भैरव्यै नम: ॥
त्रिपुरा भैरवी तंत्र मंत्र साधना
त्रिपुर भैरवी का मंत्र : मुंगे की माला से पंद्रह माला
‘ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:’
मंत्र का जाप कर सकते हैं।
माँ त्रिपुर भैरवी बीज मंत्र
माँ त्रिपुर भैरवी के बीज मंत्रों का जप करने से एक साथ अनेक संकटों से मुक्ति मिल जाती है। इन मंत्रों का जप करने वाला अत्यधिक धन का स्वामी बनकर जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य का अधिकारी बन जाता है। साथ ही मनोवांछित वर या कन्या को जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करता है।
1- ।। ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:।।
2- ।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।।
3- ।। ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:।।
जाप के नियम के लिये मेसेज करें ।
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